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Short Hindi Article - न्यूज़ एं(ठ)कर

न्यूज़ एं(ठ)कर

खबरों की दुनिया में सबसे ज्यादा तेज विस्तार अगर किसी माध्यम का हुआ है तो वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से हुआ है ।
आज ज्यादा से ज्यादा समय आदमी खबरें सुनने के लिए अपना समय टीवी के माध्यम पर फोकस कर रहा है और कोई भी खबर इलेक्ट्रॉनिक मीडियम के माध्यम से तेजी से  फैलती है।
क्योंकि आज का दर्शक सबसे ज्यादा समय अपना टीवी पर इन खबरों के चैनल पर व्यतीत कर रहा है इसलिए जितनी भी कमर्शियल कंपनियां है वह अपना ज्यादा से ज्यादा एड न्यूज़ वाले चैनल को दे रही हैं जिससे कि टीवी न्यूज़ चैनल पूरी तरह व्यवसायिक हो चुके हैं और उनका फोकस इस बात पर है कि वह ज्यादा से ज्यादा दर्शक खींचे और ज्यादा से ज्यादा एड इकट्ठा कर सकें ।
इस होड़ में वह यह भूल चुके हैं कि उनकी खबरों का समाज पर अच्छा व बुरा असर भी पड़ता है।
जैसे कि किसी जमाने में गांव पर चौपाल लगती थी और लोग आपस में किसी राजनीतिक पार्टी के विषय में वार्तालाप करते थे या फिर शहरों में अक्सर पान की दुकान या और भी कहीं किसी एक ऐसे स्थान पर विचार विमर्श करते थे लेकिन आज सभी लोग अपने-अपने घरों में टीवी की डिबेट देखते हैं और वह दर्शक किसी ना किसी एक राजनीतिक पार्टी के समर्थक होते हैं और टीवी पर जितना उत्तेजित विचार-विमर्श होता है दर्शकों को उतना ही मजा आता है और अक्सर देखा गया है कि टीवी एंकर एक रसोइए की भूमिका निभाते हैं वह उसमें तेज तड़का लगाकर डिबेट को और मसालेदार बनाते है ।
टीवी एंकर डिबेट को इस स्तर तक ले जाते हैं जैसे कि कोई भारत-पाकिस्तान का मैच हो रहा हो।
आज न्यूज़ एंकर स्वयं को किसी सुप्रीम कोर्ट के जज से कम नहीं समझते वह वहीं बैठे बैठे बिना किसी तत्वों के आधार पर फैसला सुना देते हैं साथ ही साथ काफी सारे न्यूज़ एंकर अपने फॉलोअर्स के हिसाब से डिबेट को मोड़ते हैं अगर उनके  दर्शक सत्ता पक्ष की ओर होते हैं   तो एंकर सत्ता पक्ष की तरफ से बोलने लगते हैं और अगर चैनल के दर्शक सत्ता पक्ष की  बुराई सुनना चाहते हो  तो वह डिबेट में सत्तापक्ष पर ही उंगलियां उठाते हैं ।

ज्यादातर डिबेट में यह देखा जाता है कि थोड़ी देर बाद आपके सिर में दर्द होने लगता है और  डिबेट भी अक्सर उग्र रूप ले लेती है कई बार तो मारपीट तक की नौबत आ जाती है ।
आज का दर्शक इतनी न्यूज़ देख रहा है  कि बच्चा बच्चा भी राजनीति की बातें कर रहा है और डिबेट बी असल मुद्दों पर ना होकर अक्सर बेवजह के मुद्दे पर होती है ।
कोई भी एक नेता चाहे वह सत्ता   पक्ष का हो या विपक्ष का एक छोटा-मोटा स्टेटमेंट भी दे देता है तो बयान  के ऊपर पूरा दिन डिबेट चलती है और अगले दिन उस डिबेट का तो  अता पता नहीं होता मुद्दा भी खत्म डिबेट भी खत्म और अगले दिन फिर कोई नेता कुछ भी उल्टा सीधा बयान दे देता है तो उस बयान को पकड़कर पूरा दिन डिबेट चलाते हैं।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि दर्शक भी इस तरह की आक्रमक डिबेट से बचें और स्वयं जैसा वह समाज में देख रहे हैं उसके आधार पर कोई भी निर्णय लें किसी भी डिबेट में इतने शामिल ना हो कि आप भी स्वयं उकसावे में आए तथा अपने किसी सहयोगी या मित्र से बेवजह लड़ाई कर ले क्योंकि हम अक्सर देखेंगे की सभी राजनेता एक दूसरे की शादी में समारोह में जाते हैं संसद में खूब गले मिलते हैं और दर्शक बेचारे बेवजह आपस में लड़ते हैं तो आप भी  डिबेट को सीरियसली ना लें और एंटरटेनमेंट से ज्यादा कुछ ना समझे ।
धन्यवाद

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