जैसा कि आप सब जानते हैं लोकसभा चुनाव निकट है और सभी नेता अपनी अपनी तरह से चुनाव के वायदे कर रहे हैं ऐसा ही एक वायदा राहुल गांधी जी ने भी करा जिसमें वह कह रहे हैं कि वह सभी गरीब परिवारों को ₹72000 सालाना लगभग 5 करोड परिवारों को अर्थात कुल मिलाकर 3.5 लाख करोड़ के आसपास यह बजट होगा यह घोषणा उन्हें चुनाव तो जीता देगी लेकिन इस योजना को जब उन्हें लागू करना होगा तो शायद उनकी समझ में आएगा कि यह वह क्या घोषणा कर गए। इस घोषणा का देश पर इतना भार पड़ेगा कि शायद देश की अर्थव्यवस्था भी चौपट हो जाए ।
अभी मोटे तौर पर बात करी जाए तो 2018 से 2019 तक केंद्र सरकार द्वारा जो जीएसटी कलेक्शन हुआ है वह लगभग 1300000 करोड़ के आस पास बैठता है जिसमें की सरकार को पूरे देश को चलाना होता है उसमें से अगर लगभग आप यह समझ ले कि एक चौथाई राहुल गांधी जी गरीब परिवारों बाट देंगे ।कुछ वह किसानों के कर्ज माफी में दे देंगे तथा कुछ सरकार की योजनाएं जो कि सिर्फ गरीबों के लिए चलाई जाती है उस में बांट देंगे तो कुल मिलाकर वह सब कुछ मुफ्त में बांट देंगे तो देश के विकास की रफ्तार को बढ़ाने के लिए पैसा कहां से लाएंगे।
आज सभी राजनीतिक दल वोटरों को लुभाने के लिए उल्टे सीधे वायदे कर रहे हैं जिनका की भविष्य में दुष्परिणाम मिलने की पूरी संभावना है। आज एक दल कुछ मुफ्त बढ़ने की योजना बनाता है तो दूसरा दल उससे ज्यादा मुफ्त देने की बातें करता है सभी राजनीतिक दल इसलिए मुफ्त बैठने को तैयार बैठे रहते हैं क्योंकि उनके घर से कुछ भी नहीं जाता वह सब अतिरिक्त बोझ हम जनता पर ही आता है किसी न किसी रूप में चाहे वह महंगाई के रूप में हो , टैक्स के रूप में हो या जैसे कि सड़क निर्माण, पुल निर्माण के बजट को कम करके।
हमारे देश में लगभग सभी आय वर्गों के लोग रहते हैं तथा कोई भी राजनीतिक दल या सत्तारूढ़ पार्टी सिर्फ एक ही वर्ग के बारे में कोई फैसला नहीं कर सकती क्योंकि अगर इस तरह से एक ही वर्ग को हम ध्यान में रखकर कोई भी नियम या कानून लाएंगे तो वह नियम दूसरे वर्ग का कहीं ना कहीं शोषण भी कर देता है।
अगर राजनीतिक दल सिर्फ गरीब व्यक्तियों की ही बात करते हैं तो उसका मतलब यह नहीं कि उन्हें मुफ्त में बांटा जाए गरीब को सब कुछ मुफ्त देने के बाद उसको काम न करने की आदत पड़ जाएगी तथा वह हर वक्त सरकार की ओर ही मुंह ताकता रहेगा इससे बढ़िया यह हो कि सभी सरकारा कर नए रोजगार ओं का निर्माण करें वह हर स्तर पर होना चाहिए मजदूर के स्तर पर भी, इंजीनियर के स्तर पर भी ,और सरकारी नौकरियों के स्तर पर भी तथा जो भी सरकारी या जो भी देश इस तरह से अपनी जनता को मुफ्त में बैठता है उस देश की अर्थव्यवस्था जल्दी खोपड़ी व चौपट हो जाती है यह लगभग ऐसा ही है कि जैसे कि एक पिता की दो संतान हो जिसमें से की एक संतान का कारोबार अच्छा हो तथा दूसरी संतान कुछ ना कर रही हो तो वह पिता फैसला ले कि दूसरी संतान भी पहली संतान का बोझ उठाएं इससे यह होगा कि कुछ समय बाद जो संतान अच्छा खासा कमा रही थी उसका भी दम निकल जाता है तथा थोड़े दिनों में उसकी कमाई भी आधी ही रह जाती है तो लगभग यह स्थिति वही है जैसे कि सरकार गरीबों का उद्धार के लिए जो मुफ्त की योजनाएं चला रही है वह टैक्सपेयर पर एक अतिरिक्त बोझ डालेंगे तथा धीरे-धीरे टैक्स पर भी टैक्स देने से बचेंगे क्योंकि वह यह देखेंगे कि हमारा टैक्स सही जगह नहीं जा रहा तो सरकार को गरीबों का उद्धार करना चाहिए और उसकी भी एक सीमा तय हो यह नहीं कि हर व्यक्ति को एक सरकार तनखा दे सरकार का काम है कि उन्हें रोजगार दे या जो बिल्कुल ही समाज का ऐसा तबका है जो कुछ वाकई ही नहीं कर सकता तो उसको स्वस्थ रहने की खाने पीने की गारंटी दे।
अक्सर देखा गया है कि इस तरह की मुफ्त योजनाओं का गलत तरीके से इस्तेमाल होता है तथा यह है जो सुविधा है यह समाज के उस आखिरी तक के तक नहीं पहुंच पाती जिसका न तो कोई राजनीतिक दल में उठ बैठे हैं तथा न हीं वह रिश्वत देना जानता या जुगाड़ करना जानता ।
- तो कुल मिलाकर यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई भी राजनीतिक दल जब भी वायदा कर रहा हो तो वह यह ना सोच कर करें कि उसका वायदा सबसे बड़ा हो तथा वोटर को एकदम लुभाते है क्योंकि वह राजनीति कर रहे हैं किसी कंपनी की मार्केटिंग नहीं जिसमें की कोई लूट लो ऑफर चल रहा हो।
तथा जब भी कोई इस तरह का चुनावी वायदा कर आ जा रहा हो तो कोई न कोई इस तरह की कमेटी होनी चाहिए जो यह निर्णय ले सके कि क्या भविष्य में वह चुनाव भी वायदा पूरा भी किया जा सकता है तथा उसकी हमारे देश की अर्थव्यवस्था, सामाजिक ताने-बाने और देश की आने वाली पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
यह सब कुछ शायद आपको कठिन लग रहा होगा परंतु राजनीतिक दलों के चुनावी वायदों की मॉनिटरिंग बहुत जरूरी है अन्यथा यह वायदे देश को ले डूबेंगे ।
धन्यवाद
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