Skip to main content

Short Hindi Poem - महंगाई

हो रहा था शहर में आज स्वयंवर,
लड़की ढूंढ रही थी अपने लिए वर।
लड़की की थी अच्छी खासी लंबाई,
नाम था उसका महंगाई।
महंगाई थोड़ा सा मुस्कुराई ,
बोली मुझसे आपको कहीं देखा है।
मैंने टांग रखा था फटा पुराना बस्ता ,
हाथ बढ़ाकर बोला मैं मिस्टर सस्ता।
वह गुस्से में बोली तेरा मेरा क्या मेल,
तू पुरानी चिट्ठी मैं हूं ईमेल।
मैं एक दिन में कितना ऊंचा सफर तय करती हूं,
तेरी तरह थोड़ी रेंग रेंग कर चलती हूं।
कर्ज़ मेरा बाप है मां मेरी मिसेस खर्चीली,
आम आदमी की हालत कर देती हूं पतली।
तू मेरा क्या मुकाबला कर पाएगा,
कुछ साल बाद तेरा नाम मिट्टी मिल जाएगा।
 हर सामान में मैं हूं मौजूद,
खत्म हो चुका तेरा वजूद।
तू किसी सामान में नहीं बसता है,
मेरे हिसाब से यहां आदमी ही सस्ता।
आदमी जब कोई सड़क पर गिरता है,
कोई पैदल या वाहन नहीं रुकता है।
500 का नोट जब सड़क पर पड़ा होता है,
उसे उठाने को बड़ों बड़ों का मन होता है ।
मैं मायावी हूं ,जादू करना मुझे आता है ,
पर मुझे काबू करना किसी को नहीं आता है।




Comments

Popular posts from this blog

Short Hindi Article

। दौड़ा दौड़ा  भागा भागा सा ।। आज के जीवन में जिस भी व्यक्ति को देखो  वह हर वक्त आपको भागता दिखाई देगा  , आप यह मत सोचें की वह चल  रहा है या उसके अंदर बॉडी के कोई किसी प्रकार का मूवमेंट है तभी वह चल रहा है अगर आप उसे अपने पास बैठा लेंगे तब भी देखेंगे कि उसका मन इतनी तेजी से चल रहा है ,प्रतिपल उसके मन में नए विचार आ रहे हैं और वह एक जगह  टिक कर बैठ नहीं पा रहा है अपितु अगर हम उसे देखें तो एकबारगी हम समझेंगे कि यह बैठा हुआ है परंतु अगर उसकी मन की स्थिति देखें तो वह बहुत तेजी से बदल रही है। जब तक हम अपने शरीर और मन पर नियंत्रण नहीं करेंगे तब तक हम दिशाहीन ही भागेंगे।शरीर पर नियंत्रण बड़ा आसान है हम एकदम से बॉडी के मूवमेंट को  रोकेंगे तो नियंत्रण आ जाएगा लेकिन मन में आने वाले विचारों को रोकना बहुत ही कठिन है इस पर काबू   करना बहुत ही मुश्किल हैं हालांकि हम देखेंगे कि मनुष्य ने एक से एक कठिन कार्य को बड़ी आसानी से  कर लिया है। लेकिन इसके लिए ठोस इच्छाशक्ति की जरूरत है। लेकिन अक्सर लोग एक दो दिन  तक तो अपने दृढ़निश्चय पर टिकते है और कुछ ...

टेलीपैथी का रहस्य

टेलीपैथी से ध्यान में प्रवेश -  टेलीपैथी हमें अचेतन के तल पर प्रवेश करने के बाद उपलब्ध होती है। लेकिन तीसरे तल पर टेलीपैथी में प्रवेश करने के लिए हमारे भीतर निःस्वार्थ भाव होगा, तो ही अचेतन हमारी मदद करेगा। सबका हित, सबका मंगल, यह भाव गहन होगा तो ही हम इसमें उतर पाएंगे। यदि हम किसी का अहित चाहेंगे तो हम इस प्रयोग में नहीं उतर पाएंगे। क्योंकि यह विधा जन कल्याण के लिए ही है। यदि हमारा विचार, हमारा भाव सकारात्मक होगा तो ही हम इसमें गति कर पाएंगे। नकारात्मकता के लिए इसमें कोई जगह नहीं है।  जिस व्यक्ति को भी हम टेलीपैथी से संदेश देंगे यदि हमारा संदेश उसके हित में होगा और वह हमारे प्रति प्रेमपूर्ण होगा, तो ही वह ग्राहक बन पाएगा । यदि हमारा संदेश उसके अहित में होगा तो अचेतन हमारा साथ नहीं देगा और प्रकृति भी हमारा साथ नहीं देगी।  टेलीपैथी में नकारात्मकता के लिए जगह क्यों नहीं है?  जब हम टेलीपैथी में उतरकर संदेश संप्रेषित करेंगे और यदि संदेश नकारात्मक है तो अचेतन हमें बार बार सचेत करेगा। हम ने अनुभव किया है कि जब कोई काम हमारे अनुकूल नहीं था, जिसमें दूसरे को चोट पहुंचने की सं...

स्नेह और सहयोग के साथ शक्ति रूप बनो तो राजधानी में नम्बर आगे मिल जायेगा।

• प्रश्नः- तुम्हारी याद की यात्रा पूरी कब होगी? • उत्तर:- जब तुम्हारी कोई भी कर्मेद्रियाँ धोखा ना दें, कर्मातीत अवस्था हो जाए, तब याद की यात्रा पूरी होगी। अभी तुमको पूरा पुरुषार्थ करना है, नाउम्मीद नहीं बनना है। सर्विस पर तत्पर रहना है। मीठे-मीठे बच्चे आत्म-अभिमानी होकर बैठे हो? बच्चे समझते हैं आधाकल्प हम देह-अभिमानी रहे हैं। अब देही-अभिमानी हो रहने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। बाप आकर समझाते हैं अपने को आत्मा समझकर बैठो तब ही बाप याद आयेगा। नहीं तो भूल जायेंगे। याद नहीं करेंगे तो यात्रा कैसे कर सकेंगे! पाप कैसे कटेंगे! घाटा पड़ जायेगा। यह तो घड़ी-घड़ी याद करो। यह है मुख्य बात। बाकी तो बाप अनेक प्रकार की युक्तियां बतलाते हैं। रांग क्या है, राइट क्या है - वह भी समझाया है। बाप तो ज्ञान का सागर है। भक्ति को भी जानते हैं। बच्चों को भक्ति में क्या-क्या करना पड़ता है। समझाते हैं यह यज्ञ तप आदि करना, यह सब है भक्ति मार्ग। भल बाप की महिमा करते हैं, परन्तु उल्टी। वास्तव में कृष्ण की महिमा भी पूरी नहीं जानते। हर एक बात को समझना चाहिए ना। जैसे कृष्ण को वैकुण्ठ नाथ कहा जाता है।  अच्छा, बाबा पू...