राजन और पलाश बहुत अच्छे मित्र थे बहुत दिनों बाद आज उनकी मुलाकात एक बाजार में हुई । पलाश ने राजन को बताया कि उसका तबादला भी इसी शहर में हो गया है ।
राजन पलाश को अपने घर ले गया । वहां दोनों दोस्तों की पुरानी यादें ताजा हो गई। राजन ने पलाश से अपनी पत्नी का परिचय करवाया। चाय - नाश्ता और ढेर सारी बातें करके पलाश अपने घर चला गया ।
अब वह अक्सर राजन के घर आने लगा। राजन को उसका रोज रोज घर आना और पत्नी से घुलना -मिलना अच्छा नहीं लगता था।धीरे-धीरे उसकी अपनी पत्नी से अनबन शुरू हो गई। एक दिन उसने नशे में डूब कर आत्महत्या कर ली, लेकिन उसकी आत्मा अपनी पत्नी और पलाश के बीच अटकी रही। उसे अब भी अपनी पत्नी और मित्र पर शक था।
राजन की मौत के अरसे बाद 1 दिन उसकी आत्मा ने देखा की पलाश उसके घर ही जा रहा ।उसका शक और पक्का हो गया। पलाश ने घर के दरवाजे पर जाकर घंटी बजाई ।राजन की पत्नी ,जो सूखकर काटा हो चुकी थी, बाहर आई। उसके बच्चे के तन पर फटे कपड़े झूल रहे थे। वह बोली- 'आइए भाई साहब'।
पलाश बड़ा गुमसुम-सा लग रहा था । वह बोला 'भाभी, मैंने अपना तबादला दूसरे शहर में करवा लिया है। राजन के बाद इस शहर में मेरा मन नहीं लगता । मुझे माफ करना आप लोगों को इस हालत में छोड़कर जा रहा हूं।फिर भी मुझसे जो कुछ होगा, मैं दूसरे शहर से भी करता रहूंगा।'
राजन की पत्नी ने धन्यवाद के साथ उसके प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया । कहने लगी -- ' शुक्रिया भाई साहब, लेकिन आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है । मैं तो बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर अपना गुजारा कर लेती हूं '।
पलाश वापस जाने के लिए मुड़ चुका था । राजन की आत्मा ने पलाश को खूब आवाज़ लगाई, पर अब वह शरीर कहा था , जो उसकी आवाज सुनाई देती। राजन को मरने के बाद भी चैन नहीं था, क्योंकि अब वह अपनी पत्नी, बच्चों और दोस्त की हालत के लिए खुद को जिम्मेदार मान रहा था ।
–––––––––––समाप्त–––––––––––––
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