मास्टरजी बारहवीं कक्षा के छात्रों को पढ़ा रहे थे । पढ़ाते - पढ़ाते उन्होंने गांधी जी के अहिंसा के आंदोलन के बारे में बताया । फिर वह गांधीजी के तीन बंदरों की विशेषताएं बताने लगे । एकाएक उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े सभी छात्र दंग रह गए । छात्रों के बहुत पूछने पर उन्होंने बताया कि जो विचार गांधीजी ने इन तीन बंदरों के चिन्हित करके बताए थे । लोग उसका अनुसरण उल्टे तरीके से कर रहे हैं । एक छात्र ने उठा कर पूछा - 'वह कैसे मास्टर साहब 'मास्टर जी बोले की आज जब सड़क पर कोई दुर्घटना होती है तो सब लोग आंख पर हाथ रखकर आगे निकल जाते हैं । कोई उस व्यक्ति को उठाने वाला नहीं मिलता सड़क पर जब कोई मां-बेटी से कोई बदसलूकी करता है तो सब अपनी जुबान पर हाथ रखकर आगे निकल जाते हैं । कोई अपनी आवाज नहीं उठाता । बच्चों जब किसी सरकारी दफ्तर में कोई काम लेकर जाओ तो तुम्हारी वहां कोई सुनने वाला नहीं होता । सब सरकारी कान बंद करके बैठे हैं । जनता की आवाज कोई नहीं सुनता । इसी तरह लोग इन तीन बंदरों का गलत तरीके से अनुसरण करेंगे तो हमारा देश का क्या होगा ।
नाभि पर ध्यान करने से क्या होगा ? आती-जाती श्वास पर ध्यान करने से क्या होगा? नाभि की साधना में हमें चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्मरण रखना होता है, नाभि का। श्वास के साथ नाभि भी पेट की गति के साथ उपर नीचे हो रही है। बस इतना ही स्मरण रखना है। इसके विषय में सोचना- विचारना नहीं है। सिर्फ इस बात का ख्याल भर रखना होता है। नाभि के प्रति इतना ध्यान रखना है, कि श्वास जब भीतर आई तो नाभि पेट के साथ उपर उठी है और श्वास जब बाहर गयी तो नाभि पेट के साथ नीचे गयी है। यानि पेट के साथ नाभि का डोलना हमारे ध्यान में हो! और श्वास की साधना में भी चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्मरण रखना होता है कि अब श्वास भीतर गई है, और अब श्वास बाहर गई है। इस बात का ध्यान रखना है, स्णरण रखना है कि श्वास जब भीतर जाए और श्वास जब बाहर आए, तो यह बात हमारी देखरेख में हो, हमारी निगरानी में हो। न तो इस विषय में सोचना- विचारना है, और न ही श्वास को कोई गति देना है। श्वास को अपनी लय में ही चलने देना है। सिर्फ श्वास को भीतर- बाहर, आते- जाते महसूस करना है, उसका ध्यान रखना है। हम यात्रा नाभि से भी शुरु ...
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