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"नाभि को देखना"


डिप्रेशन - 
मानसिक तनाव से तुरंत राहत देते हुए ध्यान में प्रवेश करवाने वाला एक सहज उपाय। 

सब यही कहते हैं कि तनाव से मुक्ति पाने के लिए हमें ध्यान में प्रवेश करना होगा। लेकिन जब तक हम तनाव से मुक्ति न पा लें, तब तक ध्यान में प्रवेश कैसे कर सकते हैं? तनाव ही तो हमें ध्यान में प्रवेश करने से रोके हुए हैं? 

तो पहले हम तुरंत तनाव मुक्ति का एक उपाय करते हैं। एक ऐसा उपाय जो पहले तनाव से मुक्त करेगा फिर हमें ध्यान में प्रवेश करवाएगा। 

जब भी तनाव महसूस हो और मन खिन्न होने लगे तब इस प्रयोग को करना है।

बैठ जाएं या विश्राम में लेट जाएं। आंखें बंद कर लें। शरीर को ढीला छोड़ दें। शिथिल छोड़ दें और श्वास को गहरी और धीमी लेना शुरू करें। श्वास को नाभि तक जाने दें। और कुछ भी नहीं करना है। सिर्फ श्वास को नाभि तक चलने देना है। यानि श्वास चले तब नाभि पेट के साथ उपर- नीचे उठे। ठीक वैसी श्वास लेनी है जैसी हमरे शरीर के नींद में जाने पर चलती है। नींद में हमारा पेट उपर -नीचे होता रहता है।
शरीर को ढीला रखना श्वास के गहरी होने में मदद करेगा। 

शरीर ढीला रहेगा तो श्वास स्वतः ही गहरी हो नाभि तक जाने लगेगी। हमें सिर्फ इतना ध्यान रखना है कि जब श्वास भीतर जाए तब हमारी नाभि पेट के साथ उपर उठ रही है और जब श्वास बाहर जाए तो पेट के साथ नाभि भी नीचे जा रही है। श्वास की गति से पेट के साथ नाभि का उपर-नीचे डोलना हमारे ध्यान में हो बस! यह बात हमसे चूके नहीं। नाभि का सतत उपर-नीचे, उठना-बैठना हमारी निगरानी में हो। हमें शब्दों में नहीं दौहराना है कि नाभि अब उपर जा रही है और अब नीचे जा रही है। दोहराएंगे तो विचारों की जगह शब्द आ जाएंगे। तो हमें सिर्फ श्वास की गति के साथ नाभि के उपर-नीचे आने-जाने का ध्यान रखना है। निगरानी करना है नाभि की जैसे किसान जानवरों से अपने खेत की निगरानी करता है। वैसे ही पेट के साथ नाभि का उपर-नीचे उठना-बैठना हमारी निगरानी में हो। 

ज्यों ही हम अपनी श्वास को गहरी करते हैं और नाभि तक ले जाते हैं, श्वास नाभि तक आने जाने लगती है और हम पेट के साथ ही नाभि को श्वास की गति के साथ उपर-नीचे होते हुए देखते रहते हैं... देखते रहते हैं...देखते रहते हैं त्यों ही तीन से पांच मिनट के भीतर ही हमें अनुभव में आएगा कि हम तनाव से बाहर आने लगे हैं। तनाव वाली भावदशा जा चुकी है और हमारा एक शांत और आनंदपूर्ण भावदशा में प्रवेश हो रहा है। जब तक चाहें इस प्रयोग को कर सकते हैं। 

क्या होगा श्वास को गहरी करके नाभि तक ले जाने से?

हम सारे समय विचारों में घिरे रहते हैं और विचार हमारे शरीर को तनाव में डालते हैं। जैसे ही दुश्मन का विचार आता है तो हमारा शरीर तुरंत मुठ्ठियां भींचने लगता है, दांत भींचने लगता है। यानि 'विचार' को 'क्रिया' में परिवर्तित करने लगता है। जबकि दुश्मन यहां है ही नहीं!
ऐसी ही प्रक्रियाओं के कारण हमारा शरीर सतत तनावपूर्ण बना रहता है। और शरीर जब तनाव में रहता है तो हमारी श्वास पेट तक नहीं जा पाती है, छाती तक ही जा पाती है, जिससे हमारे शरीर को बहुत कम आक्सीजन मिलती है और हमारे भीतर की अतिरिक्त उर्जा सक्रिय नहीं हो पाती है। अतः हम सदा थकान और तनाव से भरे रहते हैं। 

हम अपने भीतर उपस्थित उर्जा का बीस प्रतिशत ही उपयोग कर पाते हैं। शेष अस्सी प्रतिशत उर्जा निष्क्रिय पड़ी हुई है। उस ऊर्जा का उपयोग हम कर ही नहीं कर पाते हैं। तभी तो हम तनाव और थकान से भरे रहते हैं। क्योंकि यह बीस प्रतिशत उर्जा हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। 

क्यों हम अपने भीतर उपस्थित अतिरिक्त उर्जा का पूरा -पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं? 

क्योंकि हम कभी पूरी श्वास ही नहीं लेते हैं। हमारी श्वास छाती से ही लौट आती है, नाभि तक जाती ही नहीं है। जिससे आक्सीजन की पूरी आपूर्ति नहीं हो पाती है। आक्सीजन कम मिलती है जिससे हमारे भीतर उपस्थित उर्जा ज्यादा सक्रिय नहीं हो पाती है। 

जिस भांति बिजली के तार में छुपी उर्जा को सक्रिय करने के लिए हम अर्थ का उपयोग करते हैं, उसी भांति हमारे भीतर छुपी हुई उर्जा को सक्रिय करने के लिए हमें आक्सीजन का उपयोग करना होता है। और आक्सीजन मिलेगी गहरी श्वास से। श्वास को गहरी करके नाभि तक ले जाने से शरीर में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है, इसीलिए योग में प्राणायम का इतना महत्व है। क्योंकि प्राणायम शरीर में आक्सीजन को बढ़ाता है। 

इस प्रयोग को यदि हम करते हैं तो किसी भी प्रणायाम की जरूरत नहीं है। क्योंकि श्वास को गहरी कर नाभि तक ले जाने से शरीर को सतत आक्सीजन मिलती रहती है। इसलिए अलग से आक्सीजन बढ़ाने के लिए कोई भी प्रणायाम की जरूरत नहीं है। ज्यादा आक्सीजन बाधा पहुंचाएगी।

यदि हम श्वास को गहरा करते हैं, नाभि तक ले जाते हैं तो हमारे शरीर को ज्यादा आक्सीजन मिलने लगती है जिससे हमारे भीतर दबी पड़ी अतिरिक्त उर्जा भी हमें मिलने लगती है और हम शांत और आनंदित महसूस करने लगते हैं।

हमने महसूस किया है कि जब भी हमारे जीवन में खुशी और आनंद के पल आये हैं, वे तभी आये हैं जब हमारी श्वास ने नाभि को छुआ है। यदि हम पीछे लौटकर देखते हैं, कि किस कारण हम आनंद से भरे थे, तो हम समझ सकते हैं कि जब हमारा किसी से प्रेम हुआ था तब हमारे साथ ऐसा घटा था।

जब हमारा किसी से प्रेम हुआ था। जब हमारा प्रेमी हमारे सामने आया था, तब हमारी श्वास गहरी हो गई थी, दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। और हमारे शरीर में एक मीठी-सी सिहरन दौड़ गई थी!

क्यों घटा था प्रेमी को देखकर हमारे भीतर ऐसा?

जैसे ही हमारा प्रेमी हमारे सामने आया था, तब प्रेमी को देखकर हमारे सारे सोच -विचार रूक गए थे, और हम वर्तमान में आ गए थे। सोच -विचार के रुकते ही हमारे शरीर से सारे तनाव हट गए थे,  जिससे हमारा शरीर शिथिल हो गया था। और शरीर के शिथिल होते ही हमारी श्वास स्वतः नाभि तक जाने लगी थी और श्वास के नाभि तक जाते ही श्वास में छुपी आक्सीजन की चोट से हमारे भीतर छुपी अतिरिक्त उर्जा सक्रिय होने लगी थी और हम आनंद से भर गये थे।

यानी प्रेमी के मिलने पर जो सुख, जो आनंद हमें मिला था, वह गहरी श्वास से मिली आक्सीजन से हमारे भीतर छुपी अतिरिक्त उर्जा की सक्रियता के कारण हमारे भीतर से ही उमगा था! न कि प्रेमी से मिला था! प्रेमी तो सिर्फ माध्यम बना था, सिर्फ इस घटना का कारण बना था। 

इसी नासमझी के कारण हम अपने प्रेमी से बंध जाते हैं। यह प्रयोग हमें अपने प्रेमी से भी मुक्त करेगा। क्योंकि अब हमें पता है कि प्रेमी से मिलने का जो आनंद है वह श्वास के गहरी होने और आक्सीजन से सक्रिय हुई अपनी ही ऊर्जा का परिणाम है। अतः हम अपनी श्वास को गहरी करके उसी आनंद में प्रवेश कर जाएंगे जो आनंद प्रेमी के मिलने पर श्वास के गहरी होने पर मिलता है। 

अत: यदि हम श्वास को गहरा करते हैं, नाभी तक ले जाते हैं, तो  हमारे शरीर को ज्यादा आक्सीजन मिलती रहेगी जो हमारे शरीर में छुपी अतिरिक्त उर्जा को सक्रिय करेगी और हमें तनाव और थकान से बाहर लाएगी। अर्थात बिना प्रेमी के भी हम उसी सुख, उसी आनंद में रहेंगे जिस आनंद में हम अपने प्रेमी के साथ रहते हैं। 

ध्यान में भी हमारा शरीर शिथिल होता है और श्वास नाभि तक जाती है जिससे ज्यादा आक्सीजन मिलती है और हमारे भीतर छुपी अतिरिक्त उर्जा सक्रिय होने लगती है और हम शांत और आनंदित महसूस करते हैं। 

अर्थात प्रेम और ध्यान दोनों ही परिस्थितियों में हमारी भावदशा एक समान होती है। प्रेम और ध्यान दोनों में ही परिस्थितियों में हमारी श्वास गहरी होने पर मिली आक्सीजन के कारण हमारे भीतर की उर्जा सक्रिय होती है और हम आनंदित हो उठते हैं। 

हमारा सारा तनाव आक्सीजन की कमी के कारण ही उभरता है। जब भी हमारे शरीर में आक्सीजन की कमी होती है हम तनावपूर्ण होने लगते हैं। अतः तनाव से मुक्त हो ध्यान में प्रवेश करने के लिए हमें अपनी श्वास को पूरी लेनी होगी, श्वास को छाती से नीचे नाभि तक लेनी होगी। ताकि शरीर में ज्यादा आक्सीजन जाए और हम तनाव मुक्त हो ध्यान और आनंद में प्रवेश कर सकें। 

इस प्रयोग को हम कभी भी और कहीं भी कर सकते हैं और इसका किसी को पता भी नहीं चलेगा। सिर्फ धूल और धुंए वाली जगह पर नहीं करना है। 
यदि हम इसे सतत साधना बना लेते हैं तो तनाव मुक्ति के साथ ही हमारा ध्यान में प्रवेश आसान होता जाएगा।

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