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कुंडलिनी जागरण में नाभि और श्वास की भूमिका -


नाभि पर ध्यान करने से क्या होगा ? आती-जाती श्वास पर ध्यान करने से क्‍या होगा?

नाभि की साधना में हमें चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्‍मरण रखना होता है, नाभि का। श्‍वास के साथ नाभि भी पेट की गति के साथ उपर नीचे हो रही है। बस इतना ही स्‍मरण रखना है। इसके विषय में सोचना- विचारना नहीं है। सिर्फ इस बात का ख्याल भर रखना होता है। नाभि के प्रति इतना ध्‍यान रखना है, कि श्‍वास जब भीतर आई तो नाभि पेट के साथ उपर उठी है और श्‍वास जब बाहर गयी तो नाभि पेट के साथ नीचे गयी है। यानि पेट के साथ नाभि का डोलना हमारे ध्यान में हो!

और श्‍वास की साधना में भी चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्‍मरण रखना होता है कि अब श्‍वास भीतर गई है, और अब श्वास बाहर गई है। इस बात का ध्‍यान रखना है, स्‍णरण रखना है कि श्‍वास जब भीतर जाए और श्‍वास जब बाहर आए, तो यह बात हमारी देखरेख में हो, हमारी निगरानी में हो। न तो इस विषय में सोचना- विचारना है, और न ही श्‍वास को कोई गति देना है। श्‍वास को अपनी लय में ही चलने देना है। सिर्फ श्‍वास को भीतर- बाहर, आते- जाते महसूस करना है, उसका ध्‍यान रखना है।

हम यात्रा नाभि से भी शुरु कर सकते हैं और श्‍वास से भी शुरु कर सकते हैं। यदि हम नाभि को साधते हैं, श्‍वास की लय के साथ नभि के उपर उठने, और नीचे गिरने को सतत देखते रहते हैं, तो धीरे- धीरे श्‍वास भी हमारे ध्‍यान में आने लगेगी। नाभि के साथ ही श्‍वास के प्रति भी हमारी सजगता बढ़ने लगेगी। 

और यदि हम आती- जाती श्‍वास के प्रति सजग रहते हैं, तो धीरे- धीरे नाभि भी हमारी निगाह में आने लगती है, श्‍वास के साथ ही नाभि के प्रति भी हमारी सजगता बढ़ने लगती है। यानी एक सिरा, दूसरे सिरे को भी अपने में समेट लेता है अत: श्‍वास से या कि नाभि से, जहां से हमें सहज लगे, हम यात्रा शुरु कर सकते हैं। अंततः तो दोनों छोर एक हो जाएंगे! हां, हमें शुरु एक छोर से करना है। नाभि से या कि श्वास से। 

हमारा ध्यान जिस दिशा में होता है, हमारी ऊर्जा उसी दिशा में बहनी शुरू हो जाती है। हमारा ध्यान यदि दुश्मन के विचार पर होगा तो ऊर्जा क्रोध बनकर बाहर की ओर गति करने लगती है, और हमारा ध्यान यदि कामवासना के विचार पर होगा तो हमारी उर्जा काम केंद्र की ओर गति करने लगती है। इसी तरह हमारा ध्यान यदि नाभि पर होगा तो हमारी उर्जा नाभि चक्र की ओर बहते हुए, नाभि चक्र को सक्रिय करने लगती है ।

हमारा ध्यान सतत हमारे सिर में होता है, जहां हमारे मस्तिष्क में विचार चल रहे होते हैं । अतः हमारी सारी ऊर्जा विचारों में खर्च हो रही होती है, जिससे हम थकान और तनाव अनुभव करने लगते हैं । यदि हम अपने मस्तिष्क से, जो कि सोच विचार करता है, अपना ध्यान हटाकर नाभि पर ले जाते हैं, तो जो ऊर्जा विचार बनकर हमें तनाव दे रही थी वही उर्जा हमारे नाभि चक्र को सक्रिय करने लगती है। और हम निर्विचार हो जाते हैं ।

यदि हम विचारों को रोकने का प्रयास करते हैं तो वे और भी दोगुनी गति से आक्रमण करने लगते हैं । 
यहां हम विचारों के साथ कुछ नहीं कर रहे हैं, अपने ध्यान को मस्‍तिष्‍क से हटाकर नाभि पर ले आते हैं। हमने अपना ध्यान उस जगह से हटा लिया है जहां पर विचार पैदा होते हैं। और वहां नाभि पर लगा दिया है, जो विचार नहीं करती है। अतः नाभि पर ध्यान को लाने से हमारे विचार रुक जाते हैं या कि हम निर्विचार हो जाते हैं और हमारी जो ऊर्जा विचार बन कर बह रही थी, वही ऊर्जा नाभि चक्र को मिलने लगती है।

हमारा ध्यान जिस चीज पर होता है, वह चीज प्रभावित होने लगती है । यदि हम नाभि पर ध्यान ले जाते हैं तो नाभि प्रभावित होने लगती है नाभि डांवाडोल होने लगती है। हमने महसूस किया है कि झूला झूलते समय जब झूला नीचे आता है तो हमारी नाभि डावांडोल होती है, इस भय से कि कहीं मैं गिर ना जाऊं! यानी मौत के भय से। अर्थात नाभि चक्र यदि सोया रहा तो हमें मौत का भय सताता रहेगा। भय और संकट के क्षणों में हमारा शरीर मल-मूत्र त्यागने लगेगा, खतरे के समय कई लोग शौचालय की ओर भागते हैं, यह नाभि चक्र के सोए होने का लक्षण है ।

यदि हम नाभि चक्र पर ध्यान ले जाते हैं तो वह जागृत होने लगता है, और जब नाभि चक्र जागृत होने लगता है तो हमारा अभय में प्रवेश होने लगता है । हम निर्भय होने लगते हैं। और जब हम निर्भय होने लगते हैं, तो हमारा ध्यान में प्रवेश करना आसान होने लगता है। 

यदि हम नाभि पर ध्यान ले जाते हैं तो हमारे विचार रुक जाते हैं क्योंकि हमने अपनी चेतना की नाव को विचारों से हटाकर नाभि पर लगा दिया है। और नाभि सोच- विचार नहीं करती है। अतः हम निर्विचार हो जाते हैं। और जैसे ही हम निर्विचार होते हैं, हमें देखने वाले का, यानी साक्षी का अनुभव होना शुरू हो जाता है, उस साक्षी का जो विचारों में खोया हुआ था। 
नाभि पर ध्यान ले जाने पर साक्षी विचारों से मुक्त हो नाभि को देखने लगता है। पहले साक्षी विचारों में डूबा हुआ विचारों से एक हो गया था, विचारों और साक्षी के बीच में फासला ही नहीं था! लेकिन अब नाभि पर ध्यान ले जाते ही साक्षी विचारों से दूरी पर हो गया, और नाभि पर ध्यान ले जाते ही साक्षी को अपने होने का अनुभव होता है ! साक्षी अपने-आप को नाभि को देखते हुए पाता है। यानी यहां पर हमें पहली दफा साक्षी का बोध होगा। नाभि को जो देख रहा है वही साक्षी है! 

हमारा ध्यान जैसे ही नाभि पर होता है, हमारी जो ऊर्जा विचारों में खर्च हो रही थी, वह ऊर्जा देखने वाले की ओर, यानी साक्षी की ओर बहने लगती है और साक्षी, जो अब नाभिचक्र को देख रहा है। ऊर्जा साक्षी से बहती हुई नाभि चक्र को मिलने लगती है। 

विचारों के कारण हमारा शरीर तनाव में रहता है। हम जैसे ही अपना ध्यान विचारों से हटाकर नाभि पर ले आते हैं, हम निर्विचार हो जाते हैं। निर्विचार होते ही हमारे शरीर से तनाव हट जाते हैं और तनाव के हटते ही हमारा शरीर शिथिल होने लगता है, और शरीर के शिथिल होते ही हमारी श्वांस गहरी हो स्वत: नाभि तक जाने लगती है। 

हमारी श्वांस जब गहरी हो नाभि को छूती है, तो नाभि से नीचे मूलाधार पर श्वांस की चोंट से कंपन होने लगते हैं, क्योंकि श्वास में छुपी प्राण ऊर्जा मूलाधार पर सोई हुई कुंडलिनी उर्जा को सक्रिय करती है। जाग्रत करती है। क्योंकि प्राण ऊर्जा कुंडलिनी का भोजन है! जैसे हम यज्ञ में आहुति देते हैं और अग्नि प्रज्वलित होती है ठीक उसी भांति कुंडलिनी उर्जा भी प्राण ऊर्जा के मिलते ही ऊपर उठने लगती है!
और नाभि चक्र को सक्रिय करती हुई स्वाधिष्ठान चक्र में प्रवेश करने लगती है। 

उर्जा जब दूसरे भाव वाले तल स्वाधिष्ठान में प्रवेश करती है। हमारे भीतर कोई भाव नहीं होता है, क्योंकि नाभि पर ध्यान ले जाने पर विचार बंद हो गये। और विचार नहीं तो भाव भी नहीं होता है! यानी हमारा भाव वाला दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र शांत और शिथिल होता है! अतः कुंडलिनी उर्जा स्वाधिष्ठान में प्रवेश कर जाती है। 

हमारा ध्यान नाभि पर होता है और कोई विचार नहीं होता है, तो हमारा तीसरा विचारों वाला चक्र मणिपुर भी शांत और शिथिल होता है, ऊर्जा दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र को सक्रिय करती हुई तीसरे मणिपुर चक्र में प्रवेश कर जाती है। 

हमारा ध्यान नाभि पर होता है जिससे मन में विचार नहीं होते और विचार नहीं होने से शरीर शांत और शिथिल हो जाता है, जिससे हमारी श्वांस गहरी हो नाभि तक जाती है। जिससे कुंडलिनी उर्जा को सतत प्राण ऊर्जा मिलती रहती है, जिससे वह जागृत हो चक्रों को सक्रिय करने लगती है। और मणिपुर से उर्जा अनाहत में प्रवेश करती है और कुंडलिनी जागरण शुरू हो जाता है।

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