शीर्षासन कोई आसन नहीं है! शीर्षासन को आसन समझना हमारी भूल होगी!!
स्वामी जी मुझे सीरशासन के बारे में कुछ जानकारी देगें क्या? मुझे यह जानना है कि क्या सीरशासन करने से कुंडलिनी शक्ति नीचे की ओर सहस्त्रार चकर में आ जाती है क्या?
कुंडलिनी जागरण से पहले शीर्षासन में प्रवेश करना नुकसानदेह होगा। क्योंकि शीर्षासन कोई आसन नहीं है। शीर्षासन कुंडलिनी जागरण के बाद हमारे शरीर पर घटने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है।
शीर्षासन में प्रवेश करने पर हमारे शरीर की क्रियाशीलता प्रभावित होती है। पाचनतंत्र प्रभावित होगा और मष्तिष्क में खून का प्रवाह ज्यादा होगा जो मष्तिष्क के लिए नुकसानदायक होगा।
यदि हम अपने वाहन को उल्टा कर देंगे तो क्या होगा? आईल बाहर आएगा, डीजल- पेट्रोल बाहर आएगा और यात्रा करने की बात तो हम सोच भी नहीं सकते हैं।
जब हम अपने वाहन को उल्टा नहीं कर सकते हैं, तो अपने शरीर को कैसे उल्टा कर सकते हैं? क्योंकि हमारा शरीर भी तो अंतर्यात्रा के मार्ग में हमारा वाहन ही है!
शीर्षासन के संबंध में हमेशा से पहली बात तो यह भ्रम रहा है कि यदि उर्जा उपर नहीं उठ रही है तो शरीर को उल्टा कर लेते हैं ताकि कुंड से कुंडलिनी उर्जा नीचे की ओर बहने लगे। जबकि कुंडलिनी उर्जा का स्वभाव उपर की ओर बहना है, जैसा आग का स्वभाव उपर की ओर बहना होता है। आग को यदि उल्टा कर देंगे तब भी आग उपर की ओर ही बहेगी। तभी तो आग को कुंडलिनी उर्जा के प्रतिक रूप में चुना गया है। दूसरी बात पूर्व में हमने सन्यासियों को शीर्षासन में जाते हुए देखा है। लेकिन या तो वे कुंडलिनी जागरण के बाद शीर्षासन में गये हैं, या फिर नासमझी में किसी गुरु के अनुकरण में शीर्षासन कर रहे थे और हम भी इस बात को समझे बिना ही उनका अनुसरण करते रह गये हैं।
कुंडलिनी जागरण के बाद जब उर्जा उपर की ओर उठती है तो उर्जा को सक्रिय होने के लिये ज्यादा आक्सीजन की जरूरत होती है क्योंकि आक्सीजन उर्जा का ईंधन है, उर्जा के लिए सीढ़ी है। ज्यादा आक्सीजन होगी तभी कुंडलिनी उर्जा पूरे शरीर में फैलकर वर्तुल बना पाएगी। ज्यादा आक्सीजन होगी तभी तो हमारा शरीर भी ऊर्जा की गर्मी और प्रवाह को झेल पाएगा।
कुंडलिनी जागरण के बाद उर्जा को उपर उठाने के लिए जब आक्सीजन की जरूरत होती है, तो हमारा शरीर प्राणायाम करके उर्जा को क्रियाशील होने के लिये खून में आक्सीजन की आपूर्ति करने लगता है।
प्राणायाम के बाद जब हमारे शरीर में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है तो आक्सीजन मिलने पर कुंडलिनी उर्जा पूरे शरीर में फैलकर वर्तुल बनाती हुई घूमने लगती है।
कुंडलिनी उर्जा जब सिर में पहुंचती है और वर्तुल बनाकर पूरे शरीर में घूमने लगती है, तो हमारा पूरा शरीर उर्जा से आपूरित हो जगमगा उठता है और हमारी अंतर्यात्रा शुरू हो जाती है।
इस स्थिति में आकर साधक अपने सिर पर टोपी या कपड़ा बांधने लगता है ताकि सिर से ऊर्जा वीकिर्ण न हो और वर्तुल भी नहीं टूटे।
चेतना के तल पर तो हमारी यात्रा शुरू हो जाती है, लेकिन शारीरिक तल पर हमारा मस्तिष्क कुंडलिनी उर्जा के इस धक्के को सहने के लिए तैयार नहीं होता है। जैसे ही उर्जा मस्तिष्क में पहुंचती है और वर्तुल बनाने लगती है तो उर्जा को झेलने के लिए मस्तिष्क को बहुत ज्यादा आक्सीजन की जरूरत होती है। अतः हमारा शरीर स्वयं शीर्षासन में प्रवेश करके मस्तिष्क में ज्यादा खून पहुंचाने लगता है। ताकि खून में उपस्थित आक्सीजन उर्जा के धक्के से मस्तिष्क में होने वाले नुकसान को बचा सके।
यदि कुंडलिनी जागरण से पहले शीर्षासन में प्रवेश करते हैं, तो मस्तिष्क में ज्यादा खून पहुंचने लगता है और खून का ज्यादा प्रवाह मस्तिष्क के सूक्ष्म तंतुओं और खून की सूक्ष्म नलिकाओं को नुकसान पहुंचाएगा। और ज्यादा आक्सीजन नींद को बाधित करेगी, सोने नहीं देगी। तभी तो हम रात सोते समय सिर के नीचे तकिया लगाते हैं, क्योंकि बिना तकिये के मस्तिष्क में ज्यादा खून जाएगा और ज्यादा खून जाएगा तो आक्सीजन भी ज्यादा जाएगी और ज्यादा आक्सीजन सोने नहीं देती है। यही कारण है कि मरीज को बेहोशी या कोमा में जाने से बचाने के लिए प्राथमिक उपचार में डाक्टर मरीज के दोनों पैरों को उपर उठा देते हैं ताकि मस्तिष्क में ज्यादा खून पहुंचे और मष्तिष्क को ज्यादा आक्सीजन मिले और वह बेहोशी में न जा पाए।
आक्सीजन और कुंडलिनी उर्जा एक - दूसरे के पूरक हैं। बिना आक्सीजन के उर्जा नुकसान करेगी और बिना उर्जा के आक्सीजन नुकसान करेगी। यानी उर्जा के मस्तिष्क में पहुंचने के बाद ही शीर्षासन करके खून द्वारा ज्यादा आक्सीजन मस्तिष्क में पहुंचाना चाहिए।
और फिर यह भी जरूरी नहीं है कि कुंडलिनी जागरण के बाद शरीर शीर्षासन में जाएगा ही! क्योंकि हम किसी एक व्यक्ति को मापदंड नहीं मान सकते हैं। हर व्यक्ति के शरीर की स्थिति अलग अलग होती है। यदि किसी व्यक्ति के शरीर में पर्याप्त आक्सीजन उपलब्ध होगी तो उसका शरीर शीर्षासन में नहीं जाएगा।
मस्तिष्क में ऊर्जा पहुंचती है कुंडलिनी जागरण घटने के बाद। और कुंडलिनी जागने के बाद तो सिर में उर्जा के पहुंचने पर हमारे शरीर को यदि आक्सीजन की जरूरत होगी तो वह स्वयं ही शीर्षासन में प्रवेश करके सिर में ज्यादा खून पहुंचाकर मस्तिष्क को आक्सीजन की आपूर्ति करने लगेगा, हमें तो सिर्फ शरीर का सहयोग करना है! यानी शीर्षासन कुंडलिनी जागरण के बाद शरीर पर घटने वाली एक घटना है, न कि कुंडलिनी जागरण से पहले करने वाला कोई आसान है। अर्थात कुंडलिनी जागरण जब घटता है तो हमारा शरीर मष्तिष्क में ज्यादा आक्सीजन पहुंचाने के लिए शीर्षासन में प्रवेश करता है, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि कुंडलिनी जागरण के बाद सभी को शीर्षासन घटता ही है! यदि ज्यादा आक्सीजन सिर में पहुंच रही हो तो शीर्षासन नहीं घटेगा। अतः कुंडलिनी जागरण से पहले, या बाद में शीर्षासन में प्रवेश करना जरूरी नहीं है। और अनिवार्य तो है ही नहीं!
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