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क्या निर्विचार होना ही ध्यान है या ध्यान में निर्विचार होना है?

हमारा ध्यान जहां होगा हमारी उर्जा उस दिशा में गति करने लगती है। यदि हमारा ध्यान प्रेम में होगा तो उर्जा ह्रदय केंद्र की ओर गति करने लगती है और ह्रदय केंद्र को सक्रिय करने लगती है। यदि हमारा ध्यान कामवासना में होगा तो हमारी उर्जा कामकेंद्र की ओर गति करने लगती है और कामकेंद्र को सक्रिय करने लगती है। हमारा ध्यान जिस केंद्र पर होगा वह केंद्र सक्रिय होगा और अपना काम करेगा। 

सामान्यतः हमारा ध्यान मष्तिष्क में होता है तो उर्जा मष्तिष्क की ओर गति करने लगती है और मष्तिष्क सक्रिय होने लगता है, यानी विचार करने लगता है। यदि हम आज्ञाचक्र या किसी वस्तु पर अपना ध्यान ले जाते हैं तो निर्विचार हो जाते हैं। क्योंकि हमरे विचार का केंद्र है मष्तिष्क जो विचार करता है और यदि हम अपने मष्तिष्क से ध्यान हटाकर आज्ञाचक्र पर ले जाते हैं तो हमारे विचार इसलिए रूकते हैं कि आज्ञाचक्र विचार का केंद्र नहीं है। आज्ञाचक्र विचार नहीं करता है, विचार करता मष्तिष्क! 

हमने यहां विचारों के साथ कुछ नहीं किया है, सिर्फ अपनी चेतना को मष्तिष्क से हटाकर आज्ञाचक्र पर ले आए हैं और आज्ञाचक्र विचार नहीं करता है इसलिए हम निर्विचार हो जाते हैं। अब विचार तभी आएंगे जब हमारा ध्यान आज्ञाचक्र से वापस मष्तिष्क में जाएगा, क्योंकि मष्तिष्क विचार करता है। 

दूसरी बात है : क्या निर्विचार होना ही ध्यान है या ध्यान में निर्विचार होना है? 

निर्विचार होना ही ध्यान है। और ध्यान में हम निर्विचार हो जाते हैं। 
इस बात को हम इस तरह से भी कह सकते हैं कि यदि हम निर्विचार हो जाते हैं तो ध्यान में प्रवेश कर जाते हैं और यदि हम ध्यान में प्रवेश कर जाते हैं तो निर्विचार हो जाते हैं। घटना दोनों ओर से घट सकती है।

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