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"सपनों का का विज्ञान

यही तो है हमारा भविष्यफल लिखने वाला! 
यही तो है चित्रगुप्त!. हमारा अचेतन... 

हमारे सपनों के कुछ हिस्से तो दिन भर के विचारों से जुड़े हुए होते है। और कुछ हिस्से हमारे अतीत और भविष्य से संबंधित विचारों से जुड़े हुए होते हैं। जिन सपनों का हमने विचार किया और वे आए यह तो ठीक है लेकिन जिन सपनों का हमने विचार नहीं किया वह कैसे आ गया है? 

हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह जो सपना मैंने देखा है ऐसा मैंने नहीं सोचा है? या इसका मैंने कोई विचार नहीं किया है! हमने ऐसा सोचा है। सपने हमारी नींद की गहराई से बहुत संबंध रखते हैं। जैसे-जैसे नींद गहरी होती जाएगी वैसे-वैसे सपने बदलते जाएंगे। हमने अतीत में कोई विचार किया था। बार-बार किया था और आज हम उसे भूल चुके हैं। वह विचार पूरा नहीं हुआ और समय के साथ वह अचेतन की और भी गहरी पर्त में चला जाता है। ज्यों ही नींद की गहराई उस परत को छुती है अचेतन पूर्व में गहरे दबे इस विचार को स्वप्न में परिवर्तित कर दिखाने लगता है। हमें समझ में इसलिए नहीं आता है क्योंकि  सपने में उसकी भाषा बदली हुई होती है। उसकी भाषा प्रतिकों की होती है, विचारों की नहीं होती है।

हमने अपने शुरुआती दिनों में बहुत उन्नति करने की, उपर जाने की, ऊंचा उठने की, बड़े पद पर पहुंचने के सपने देखे हैं। वे सपने पूरे नहीं हुए हैं। और वे सपनें अचेतन में और और गहरे चले गए हैं। जब हम गहरी नींद में अचेतन की उस गहरी पर्त तक पहुंचते हैं तो वह उन्नति करने वाला, ऊंचा उठने वाला विचार हमारा इंतजार कर रहा होता है क्योंकि वह पूरा नहीं हुआ है और पूरा होगा भी नहीं! इसी विचार ने ही तो हमें सम्मोहित कर रखा है। 

पूर्व में किये उन्नति करने के, ऊंचा उठने के इस विचार को अचेतन पिक्चर की तरह दिखाएगा। वह हमें दिखाएगा कि हम कलेक्टर बन गये हैं और अधिकारियों को निर्देश दे रहे हैं। उसका कहने का ढंग बदल जाएगा। हम सोचेंगे हमने कलेक्टर होने की बात तो आज सोची ही नहीं थी? आज नहीं सोची थी, लेकिन पूर्व में ऊंचा उठने की बात सोची थी जो आज भी अचेतन में दबी पड़ी है। और अचेतन इसे कलेक्टर बना कर पूरा कर रहा है। 

हम इस भूल में न रहें कि अचेतन से कोई बात छूट जाएगी? हमारे पूर्व जन्मों और आज तक के सारे भाव, विचार और कर्म सभी इसमें दर्ज हें। हमने अकेले में क्या पुण्य किया है और क्या पापा किया है यह बात हमारा अचेतन जानता है। लोग कहते हैं कि भगवान से डरो भगवान देख रहा है और चित्रगुप्त हमारे कर्मों का लेखा-जोखा लिख रहा है। यही हमारा अचेतन ही चित्रगुप्त! यह चित्रों की भाषा में हमारे सारे विचारों को, कर्मों को भगवान को दिखाने के लिए दर्ज कर रहा है। यह चित्रों में दिखाता है इसलिए इसका नाम चित्रगुप्त है। भगवान का बही-खाता लिखने वाला! चित्रगुप्त।

हमारा अचेतन ऊंचा उठने की इस बात को दूसरी तरह से भी दिखा सकता है। वह हमें दिखाएगा कि हम आकाश में उड़ रहे हैं और सब लोगों के उपर से उड़ते हुए आसमान में बहुत ऊंचाई पर उड़ रहे हैं और सब लोग हमारे नीचे हैं। हम सोचेंगे आज तो मैंने उड़ने की बात सोची ही नहीं है? आज नहीं सोची है। ऊंचा उठने की बात हमने पूर्व में सोची है, जो समय के साथ अचेतन की और भी गहरी पर्तें में चली गई है। गहरी नींद में जब हम उस पर्त को छूते हैं तो वह बात सपना बनकर दिखाई देती है। 

सपने में अचेतन का कहने का ढंग चित्रों का होता है। फिल्म की भाषा का होता है। इसलिए हम समझ नहीं पाते हैं।  जैसे बचपन में हमने "क" से "कमल" पढ़ा है। अब "क" को सपने में हमारा अचेतन "कमल" के प्रतिक रुप में दिखाएगा! हम यह बात भूल ही जाते हैं कि सपने में आए उसी कमल को हमने पूर्व में क क क कहकर कहकर अचेतन में डाल दिया है और अचेतन हमारे क को कमल दिखा रहा है तो हम कहते हैं हमने कमल तो सोचा ही नहीं था? 

हमारे सोचने की भाषा अलग है और अचेतन का कहने का ढंग अलग है? हम शब्दों में "क" लिखते हैं और हमारा अचेतन उस क को "कमल" का फूल दिखाकर उसे चित्रों में अभिव्यक्त कर देता है। हमारा अतीत और भविष्य सबकुछ इसमें दर्ज है। हम इस भूल में न रहें कि अचेतन से कोई बात छूट जाएगी? हमारे पूर्व जन्मों और आज तक के सारे भाव, विचार और कर्म इसमें दर्ज हैं। यही तो है बही-खाता लिखने वाला! यही तो है चित्रगुप्त।

हम शब्दों में सोचते हैं और लिखते हैं लेकिन हमारा अचेतन उसे चित्रों में संजो कर रखता है। इसीलिए इसे चित्रगुप्त कहा गया है।

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