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‘‘अन्तः वाहक शरीर द्वारा सेवा...’’



एक सेकण्ड में कितना दूर से दूर जा सकते हो, हिसाब निकाल सकते हो...? जैसे मरने के बाद आत्मा एक सेकण्ड में कहाँ पहुँच जाती है...! ऐसे आप भी अन्तः वाहक शरीर द्वारा ... अन्तः वाहक शरीर जो कहते हैं, उसका भावार्थ क्या है...? आप लोगों का जो गायन है कि अन्तः वाहक शरीर द्वारा बहुत सैर करते थे, उसका अर्थ क्या है...? यह गायन सिर्फ दिव्य-दृष्टि वालों का नहीं है, लेकिन आप सभी का है। वह लोग तो अन्तः वाहक शरीर का अपना अर्थ बताते हैं। लेकिन यथार्थ अर्थ यही है कि अन्त के समय की जो आप लोगों की कर्मातीत अवस्था की स्थिति है, वह जैसे वाहन होता है ना, कोई-न-कोई वाहन द्वारा सैर किया जाता है, कहाँ का कहाँ पहुँच जाते हैं...! वैसे जब कर्मातीत अवस्था बन जाती है तो यह स्थिति होने से एक सेकण्ड में कहाँ का कहाँ पहुँच सकते हैं। इसलिए अन्तः वाहक शरीर कहते हैं। 

वास्तव में यह अन्तिम स्थिति का गायन है। उस समय आप इस स्थूल स्वरूप के भान से परे रहते हो, इसलिए इनको सूक्ष्म शरीर भी कह दिया है। जैसे कहावत है - उड़ने वाला घोड़ा...। 
तो इस समय के आप सभी के अनुभव की यह बातें हैं जो कहानियों के रूप में बनाई हुई हैं। एक सेकण्ड में ऑर्डर किया यहाँ पहुँचों, तो वहाँ पहुँच जायेगा...। ऐसा अपना अनुभव करते जाते हो...? जैसे आजकल साइंस भी स्पीड को क्विक करने में लगी हुई है। जहाँ तक हो सकता है ‘समय कम और सफलता ज्यादा’ का पुरूषार्थ कर रहे हैं। ऐसे ही आप लोगों का पुरूषार्थ भी हर बात में स्पीड को बढ़ाने का चल रहा है...? जितनी-जितनी जिसकी स्पीड बढ़ेगी उतना ही अपने फाइनल स्टेज के नज़दीक आयेंगे। स्पीड से स्टेज तक पहुँचेंगे...। अपनी स्पीड से स्टेज को परख सकते हो...!

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