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Showing posts from July, 2020

क्या निर्विचार होना ही ध्यान है या ध्यान में निर्विचार होना है?

हमारा ध्यान जहां होगा हमारी उर्जा उस दिशा में गति करने लगती है। यदि हमारा ध्यान प्रेम में होगा तो उर्जा ह्रदय केंद्र की ओर गति करने लगती है और ह्रदय केंद्र को सक्रिय करने लगती है। यदि हमारा ध्यान कामवासना में होगा तो हमारी उर्जा कामकेंद्र की ओर गति करने लगती है और कामकेंद्र को सक्रिय करने लगती है। हमारा ध्यान जिस केंद्र पर होगा वह केंद्र सक्रिय होगा और अपना काम करेगा।  सामान्यतः हमारा ध्यान मष्तिष्क में होता है तो उर्जा मष्तिष्क की ओर गति करने लगती है और मष्तिष्क सक्रिय होने लगता है, यानी विचार करने लगता है। यदि हम आज्ञाचक्र या किसी वस्तु पर अपना ध्यान ले जाते हैं तो निर्विचार हो जाते हैं। क्योंकि हमरे विचार का केंद्र है मष्तिष्क जो विचार करता है और यदि हम अपने मष्तिष्क से ध्यान हटाकर आज्ञाचक्र पर ले जाते हैं तो हमारे विचार इसलिए रूकते हैं कि आज्ञाचक्र विचार का केंद्र नहीं है। आज्ञाचक्र विचार नहीं करता है, विचार करता मष्तिष्क!  हमने यहां विचारों के साथ कुछ नहीं किया है, सिर्फ अपनी चेतना को मष्तिष्क से हटाकर आज्ञाचक्र पर ले आए हैं और आज्ञाचक्र विचार नहीं करता है इसलिए हम निर्वि...

क्या हैं ध्यान के तीन चरण ? वैज्ञानिक दृष्टिकोण

**************** ध्यान के तीन चरण;-  1-अगर पहला चरण न हो,  तो बड़े खतरे हैं। पहले चरण से आपके शरीर की पूरी विद्युत विकसित होकर आपके शरीर के चारों तरफ वर्तुल बना लेती है। अगर यह वर्तुल न बने, तो आपको ऐसी बीमारियां पकड़ सकती हैं जिनकी आपको कल्पना भी नहीं है। आप बीमारियों के लिए नॉन-रेसिस्टेंस की हालत में हो जाते हैं। इसलिए बहुत से लोग अजीब-अजीब बीमारियों से पीड़ित हो जाते हैं। इसलिए पहला चरण पूरा होना बहुत जरूरी है। 2-आपके चारों तरफ विद्युत का वर्तुल बनना जरूरी है। अन्यथा ध्यान में एक तरह की वल्नरेबल, एक तरह की ओपनिंग, एक तरह का द्वार खुलता है, उसमें से कुछ भी प्रवेश हो सकता है। और न केवल बीमारी प्रवेश हो सकती है, बल्कि अनेक साधकों को जो बड़ी से बड़ी कठिनाई हुई है वह यह कि कुछ दुष्ट आत्माएं उनमें प्रवेश कर सकती हैं। 3-ध्यान की हालत में आपके हृदय का द्वार खुला हो जाता है। उस वक्त कोई भी प्रवेश कर सकता है। और हमारे चारों तरफ बहुत तरह की आत्माएं निरंतर उपस्थित हैं। यहां आप ही उपस्थित नहीं हैं, और भी कोई उपस्थित हैं। इसलिए पहले चरण को हर हालत में पूरा करना जरूरी है। अगर पहला चरण पूरा है ...

"नाभि को देखना"

डिप्रेशन -  मानसिक तनाव से तुरंत राहत देते हुए ध्यान में प्रवेश करवाने वाला एक सहज उपाय।  सब यही कहते हैं कि तनाव से मुक्ति पाने के लिए हमें ध्यान में प्रवेश करना होगा। लेकिन जब तक हम तनाव से मुक्ति न पा लें, तब तक ध्यान में प्रवेश कैसे कर सकते हैं? तनाव ही तो हमें ध्यान में प्रवेश करने से रोके हुए हैं?  तो पहले हम तुरंत तनाव मुक्ति का एक उपाय करते हैं। एक ऐसा उपाय जो पहले तनाव से मुक्त करेगा फिर हमें ध्यान में प्रवेश करवाएगा।  जब भी तनाव महसूस हो और मन खिन्न होने लगे तब इस प्रयोग को करना है। बैठ जाएं या विश्राम में लेट जाएं। आंखें बंद कर लें। शरीर को ढीला छोड़ दें। शिथिल छोड़ दें और श्वास को गहरी और धीमी लेना शुरू करें। श्वास को नाभि तक जाने दें। और कुछ भी नहीं करना है। सिर्फ श्वास को नाभि तक चलने देना है। यानि श्वास चले तब नाभि पेट के साथ उपर- नीचे उठे। ठीक वैसी श्वास लेनी है जैसी हमरे शरीर के नींद में जाने पर चलती है। नींद में हमारा पेट उपर -नीचे होता रहता है। शरीर को ढीला रखना श्वास के गहरी होने में मदद करेगा।  शरीर ढीला रहेगा तो श्वास स्वतः ही गहरी हो नाभि ...

"सपनों का का विज्ञान

यही तो है हमारा भविष्यफल लिखने वाला!  यही तो है चित्रगुप्त!. हमारा अचेतन...  हमारे सपनों के कुछ हिस्से तो दिन भर के विचारों से जुड़े हुए होते है। और कुछ हिस्से हमारे अतीत और भविष्य से संबंधित विचारों से जुड़े हुए होते हैं। जिन सपनों का हमने विचार किया और वे आए यह तो ठीक है लेकिन जिन सपनों का हमने विचार नहीं किया वह कैसे आ गया है?  हम यह नहीं कह सकते हैं कि यह जो सपना मैंने देखा है ऐसा मैंने नहीं सोचा है? या इसका मैंने कोई विचार नहीं किया है! हमने ऐसा सोचा है। सपने हमारी नींद की गहराई से बहुत संबंध रखते हैं। जैसे-जैसे नींद गहरी होती जाएगी वैसे-वैसे सपने बदलते जाएंगे। हमने अतीत में कोई विचार किया था। बार-बार किया था और आज हम उसे भूल चुके हैं। वह विचार पूरा नहीं हुआ और समय के साथ वह अचेतन की और भी गहरी पर्त में चला जाता है। ज्यों ही नींद की गहराई उस परत को छुती है अचेतन पूर्व में गहरे दबे इस विचार को स्वप्न में परिवर्तित कर दिखाने लगता है। हमें समझ में इसलिए नहीं आता है क्योंकि  सपने में उसकी भाषा बदली हुई होती है। उसकी भाषा प्रतिकों की होती है, विचारों की नहीं होती है।...

"शीर्षासन"

शीर्षासन कोई आसन नहीं है! शीर्षासन को आसन समझना हमारी भूल होगी!! स्वामी जी मुझे सीरशासन के बारे में कुछ जानकारी देगें क्या? मुझे यह जानना है कि क्या सीरशासन करने से कुंडलिनी शक्ति नीचे की ओर सहस्त्रार चकर में आ जाती है क्या?  कुंडलिनी जागरण से पहले शीर्षासन में प्रवेश करना नुकसानदेह होगा। क्योंकि शीर्षासन कोई आसन नहीं है। शीर्षासन कुंडलिनी जागरण के बाद हमारे शरीर पर घटने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है। शीर्षासन में प्रवेश करने पर हमारे शरीर की क्रियाशीलता प्रभावित होती है। पाचनतंत्र प्रभावित होगा और मष्तिष्क में खून का प्रवाह ज्यादा होगा जो मष्तिष्क के लिए नुकसानदायक होगा। यदि हम अपने वाहन को उल्टा कर देंगे तो क्या होगा? आईल बाहर आएगा, डीजल- पेट्रोल बाहर आएगा और यात्रा करने की बात तो हम सोच भी नहीं सकते हैं। जब हम अपने वाहन को उल्टा नहीं कर सकते हैं, तो अपने शरीर को कैसे उल्टा कर सकते हैं? क्योंकि हमारा शरीर भी तो अंतर्यात्रा के मार्ग में हमारा वाहन ही है!  शीर्षासन के संबंध में हमेशा से पहली बात तो यह भ्रम रहा है कि यदि उर्जा उपर नहीं उठ रही है तो शरीर को उल्टा कर लेते हैं ताकि ...

"शवासन"

शरीर और मन से तनाव दूर कर साक्षी में प्रवेश करवाने वाला अद्भुत आसन -  शवासन योग का आरंभिक चरण है। शवासन हमारे शरीर को उस स्थिति में प्रवेश करवाता है जिस स्थिति में ध्यान आसानी से घटित हो सके। शवासन का मतलब है कि शव या मुरदा जिस आसन या स्थिति में होता है, अपने शरीर को उस स्थिति में ले जाना। जिस भांति मुरदा न श्वास लेता, न कोई हलचल करता, चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है, चेहरा निर्भाव होता है, ठीक उसी स्थिति में अपने शरीर को ले जाना शवासन कहलाता है। मुर्दे के जैसा चेहरा तब होता है जब हमारे चेहरे पर कोई भाव नहीं होता है और मुर्दे जैसा शरीर तब होता है जब हमारे मन में कोई भी विचार नहीं होता है। यानि ध्यान वाली स्थिति। ध्यान वाली स्थिति में हमारा शरीर मुर्दे जैसा शांत और शिथिल हो जाता है।  जब हमारा ध्यान वाली स्थिति में प्रवेश होता है, अचेतन में प्रवेश होता है, तब चेहरे से भाव और मन से विचार विलिन होने लगते हैं। भाव और विचारों के विलिन होते ही मन शांत होने लगता है और मन के शांत और शिथिल होते ही शरीर एक स्थिति में प्रवेश करता है। वह शांत और शिथिल हो उस स्थिति में प्रवेश करता है जिस स्थि...

कुंडलिनी जागरण में नाभि और श्वास की भूमिका -

नाभि पर ध्यान करने से क्या होगा ? आती-जाती श्वास पर ध्यान करने से क्‍या होगा? नाभि की साधना में हमें चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्‍मरण रखना होता है, नाभि का। श्‍वास के साथ नाभि भी पेट की गति के साथ उपर नीचे हो रही है। बस इतना ही स्‍मरण रखना है। इसके विषय में सोचना- विचारना नहीं है। सिर्फ इस बात का ख्याल भर रखना होता है। नाभि के प्रति इतना ध्‍यान रखना है, कि श्‍वास जब भीतर आई तो नाभि पेट के साथ उपर उठी है और श्‍वास जब बाहर गयी तो नाभि पेट के साथ नीचे गयी है। यानि पेट के साथ नाभि का डोलना हमारे ध्यान में हो! और श्‍वास की साधना में भी चलते-फिरते, उठते-बैठते एक ही बात का स्‍मरण रखना होता है कि अब श्‍वास भीतर गई है, और अब श्वास बाहर गई है। इस बात का ध्‍यान रखना है, स्‍णरण रखना है कि श्‍वास जब भीतर जाए और श्‍वास जब बाहर आए, तो यह बात हमारी देखरेख में हो, हमारी निगरानी में हो। न तो इस विषय में सोचना- विचारना है, और न ही श्‍वास को कोई गति देना है। श्‍वास को अपनी लय में ही चलने देना है। सिर्फ श्‍वास को भीतर- बाहर, आते- जाते महसूस करना है, उसका ध्‍यान रखना है। हम यात्रा नाभि से भी शुरु ...

"कर्मातीत स्थिति की निशानियाँ"

गीता ज्ञान का पहला पाठ - अशरीरी आत्मा बनो और अन्तिम पाठ - नष्टोमोहा, स्मृतिस्वरूप बनो। तो पहला पाठ है विधि और अन्तिम पाठ है विधि से सिद्धि। तो गीता पाठशाला वाले हर समय यह पाठ पढ़ते हैं कि सिर्फ मुरली सुनाते हैं...? क्योंकि सच्ची गीता-पाठशाला की विधि यह है - पहले स्वयं पढ़ना अर्थात् बनना फिर औरों को निमित्त बन पढ़ाना। तो सभी इस विधि से सेवा करते हो...? क्योंकि आप सभी इस विश्व के आगे परमात्म पढ़ाई का सैम्पल हो। तो सैम्पल का महत्त्व होता है। सैम्पल अनेक आत्माओं को ऐसा बनने की प्रेरणा देता है। तो गीता-पाठशाला वालों के ऊपर बड़ी ज़िम्मेवारी है।  अगर ज़रा भी सैम्पल बनने में कमी दिखाई तो अनेक आत्माओं के भाग्य बनाने के बजाए, भाग्य बनाने से वंचित करने के निमित्त भी बन जायेंगे ... क्योंकि देखने वाले, सुनने वाले साकार रूप में आप निमित्त आत्माओं को देखते हैं। बाप (निराकार परमात्मा शिव) तो गुप्त हैं ना...! इसलिए ऐसा श्रेष्ठ कर्म सदा करके दिखाओ जो आपके श्रेष्ठ कर्मों को देख, अनेक आत्माओं के श्रेष्ठ कर्मों के भाग्य की रेखा श्रेष्ठ बना सको। तो एक तो अपने को सदा सैम्पल समझना और दूसरा, सदा अपना सिम्बल याद र...

‘‘अन्तः वाहक शरीर द्वारा सेवा...’’

एक सेकण्ड में कितना दूर से दूर जा सकते हो, हिसाब निकाल सकते हो...? जैसे मरने के बाद आत्मा एक सेकण्ड में कहाँ पहुँच जाती है...! ऐसे आप भी अन्तः वाहक शरीर द्वारा ... अन्तः वाहक शरीर जो कहते हैं, उसका भावार्थ क्या है...? आप लोगों का जो गायन है कि अन्तः वाहक शरीर द्वारा बहुत सैर करते थे, उसका अर्थ क्या है...? यह गायन सिर्फ दिव्य-दृष्टि वालों का नहीं है, लेकिन आप सभी का है। वह लोग तो अन्तः वाहक शरीर का अपना अर्थ बताते हैं। लेकिन यथार्थ अर्थ यही है कि अन्त के समय की जो आप लोगों की कर्मातीत अवस्था की स्थिति है, वह जैसे वाहन होता है ना, कोई-न-कोई वाहन द्वारा सैर किया जाता है, कहाँ का कहाँ पहुँच जाते हैं...! वैसे जब कर्मातीत अवस्था बन जाती है तो यह स्थिति होने से एक सेकण्ड में कहाँ का कहाँ पहुँच सकते हैं। इसलिए अन्तः वाहक शरीर कहते हैं।  वास्तव में यह अन्तिम स्थिति का गायन है। उस समय आप इस स्थूल स्वरूप के भान से परे रहते हो, इसलिए इनको सूक्ष्म शरीर भी कह दिया है। जैसे कहावत है - उड़ने वाला घोड़ा...।  तो इस समय के आप सभी के अनुभव की यह बातें हैं जो कहानियों के रूप में बनाई हुई हैं। एक सेक...

टेलीपैथी का रहस्य

टेलीपैथी से ध्यान में प्रवेश -  टेलीपैथी हमें अचेतन के तल पर प्रवेश करने के बाद उपलब्ध होती है। लेकिन तीसरे तल पर टेलीपैथी में प्रवेश करने के लिए हमारे भीतर निःस्वार्थ भाव होगा, तो ही अचेतन हमारी मदद करेगा। सबका हित, सबका मंगल, यह भाव गहन होगा तो ही हम इसमें उतर पाएंगे। यदि हम किसी का अहित चाहेंगे तो हम इस प्रयोग में नहीं उतर पाएंगे। क्योंकि यह विधा जन कल्याण के लिए ही है। यदि हमारा विचार, हमारा भाव सकारात्मक होगा तो ही हम इसमें गति कर पाएंगे। नकारात्मकता के लिए इसमें कोई जगह नहीं है।  जिस व्यक्ति को भी हम टेलीपैथी से संदेश देंगे यदि हमारा संदेश उसके हित में होगा और वह हमारे प्रति प्रेमपूर्ण होगा, तो ही वह ग्राहक बन पाएगा । यदि हमारा संदेश उसके अहित में होगा तो अचेतन हमारा साथ नहीं देगा और प्रकृति भी हमारा साथ नहीं देगी।  टेलीपैथी में नकारात्मकता के लिए जगह क्यों नहीं है?  जब हम टेलीपैथी में उतरकर संदेश संप्रेषित करेंगे और यदि संदेश नकारात्मक है तो अचेतन हमें बार बार सचेत करेगा। हम ने अनुभव किया है कि जब कोई काम हमारे अनुकूल नहीं था, जिसमें दूसरे को चोट पहुंचने की सं...

‘‘पाॅवरफुल वृत्ति से सर्विस में वृद्धि’’

अभी जो भी आत्माएं आगे बढ़ते-बढ़ते अब जहाँ तक पहुँच गई हैं, उससे आगे बढ़ाने के लिए विशेष आत्माओं को विशेष क्या करना है...? जिन आत्माओं के निमित्त बने हो उन आत्माओं में भी शक्तिरूप से शक्ति भरने की आवश्यकता है। वर्तमान समय के मैजाॅरिटी आत्माओं की रिज़ल्ट क्या दिखाई देती है...? पीछे हटेंगे भी नहीं और आगे बढ़ेंगे भी नहीं। अटके हुए भी नहीं हैं, लटके हुए भी नहीं हैं ... लेकिन शक्ति नहीं है जो जम्प दे सकें...! एक्स्ट्रा फोर्स चाहिए। जैसे राॅकेट में फोर्स भरकर इतना ऊपर भेजते हैं ना, तो अभी आत्माओं को परवरिश चाहिए। अपनी यथा शक्ति से जम्प नहीं दे सकते। विशेष आत्माओं को विशेष शक्ति भरकर के हाई जम्प दिलाना है। चाहते हैं, पुरूषार्थ भी करते हैं, लेकिन अभी फोर्स चाहिए।  वह फोर्स कैसे देंगे...?  जब पहले अपने में इतना फोर्स हो जो अपने को तो आगे बढ़ा सको, लेकिन शक्ति का दान भी कर सको। जैसे ज्ञान का दान करते हो, वैसे अभी चाहिए शक्ति का बल। अभी वरदातापन का कर्तव्य करना है। ज्ञानदाता बन बहुत किया, अब शक्तियों का वरदाता बनना है। इसलिए शक्तियों के आगे सदैव वर मांँगते हैं। सिद्धि कैसे मिलेगी शक्तियों द्वार...

"रूहानी सेवा - नि:स्वार्थ सेवा"

आज सर्व आत्माओं के विश्व कल्याणकारी बाप अपने सेवाधारी सेवा के साथी बच्चों को देख रहे हैं। आदि से बापदादा के साथ-साथ सेवाधारी बच्चे साथी बने और अन्त तक बापदादा ने गुप्त रूप में और प्रत्यक्ष रूप में बच्चों को विश्व सेवा के निमित्त बनाया। आदि में ब्रह्मा बाप और ब्राह्मण बच्चे गुप्त रूप में सेवा के निमित्त बनें।  अभी सेवाधारी बच्चे शक्ति सेना और पाण्डव सेना विश्व के आगे प्रत्यक्ष रूप में कार्य कर रहे हैं। सेवा का उमंग-उत्साह मैजारिटी बच्चों में अच्छा दिखाई देता है। सेवा की लगन आदि से रही है और अन्त तक रहेगी। ब्राह्मण जीवन ही सेवा का जीवन है। ब्राह्मण आत्मायें सेवा के बिना जी नहीं सकती। माया से जिन्दा रखने का श्रेष्ठ साधन सेवा ही है। सेवा योगयुक्त भी बनाती है। लेकिन कौन सी सेवा? एक है सिर्फ मुख की सेवा, सुना हुआ सुनाने की सेवा। दूसरी है मन से मुख की सेवा। सुने हुए मधुर बोल का स्वरूप बन, स्वरूप से सेवा, नि:स्वार्थ सेवा। त्याग, तपस्या स्वरूप से सेवा। हद की कामनाओं से परे निष्काम सेवा। इसको कहा जाता है ईश्वरीय सेवा, रूहानी सेवा। जो सिर्फ मुख की सेवा है उसको कहते हैं सिर्फ स्वयं को खुश करने...

स्नेह और सहयोग के साथ शक्ति रूप बनो तो राजधानी में नम्बर आगे मिल जायेगा।

• प्रश्नः- तुम्हारी याद की यात्रा पूरी कब होगी? • उत्तर:- जब तुम्हारी कोई भी कर्मेद्रियाँ धोखा ना दें, कर्मातीत अवस्था हो जाए, तब याद की यात्रा पूरी होगी। अभी तुमको पूरा पुरुषार्थ करना है, नाउम्मीद नहीं बनना है। सर्विस पर तत्पर रहना है। मीठे-मीठे बच्चे आत्म-अभिमानी होकर बैठे हो? बच्चे समझते हैं आधाकल्प हम देह-अभिमानी रहे हैं। अब देही-अभिमानी हो रहने के लिए मेहनत करनी पड़ती है। बाप आकर समझाते हैं अपने को आत्मा समझकर बैठो तब ही बाप याद आयेगा। नहीं तो भूल जायेंगे। याद नहीं करेंगे तो यात्रा कैसे कर सकेंगे! पाप कैसे कटेंगे! घाटा पड़ जायेगा। यह तो घड़ी-घड़ी याद करो। यह है मुख्य बात। बाकी तो बाप अनेक प्रकार की युक्तियां बतलाते हैं। रांग क्या है, राइट क्या है - वह भी समझाया है। बाप तो ज्ञान का सागर है। भक्ति को भी जानते हैं। बच्चों को भक्ति में क्या-क्या करना पड़ता है। समझाते हैं यह यज्ञ तप आदि करना, यह सब है भक्ति मार्ग। भल बाप की महिमा करते हैं, परन्तु उल्टी। वास्तव में कृष्ण की महिमा भी पूरी नहीं जानते। हर एक बात को समझना चाहिए ना। जैसे कृष्ण को वैकुण्ठ नाथ कहा जाता है।  अच्छा, बाबा पू...

जहाँ सर्वशक्तियां हैं, वहाँ निर्विघ्न सफलता साथ है।

• प्रश्नः- तुम बच्चों को अभी कौन-सा प्रयत्न पूरा-पूरा करना है? • उत्तर:- सिर पर जो विकर्मों का बोझा है उसे उतारने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना है। बाप का बनकर कोई विकर्म किया तो बहुत ज़ोर से गिर पड़ेंगे। बी.के. की अगर निंदा कराई, कोई तकलीफ दी तो बहुत पाप हो जायेगा। फिर ज्ञान सुनने-सुनाने से कोई फायदा नहीं। रूहानी बाप बच्चों को समझा रहे हैं कि तुम पतित से पावन बन पावन दुनिया का मालिक कैसे बन सकते हो! पावन दुनिया को स्वर्ग अथवा विष्णुपुरी, लक्ष्मी-नारायण का राज्य कहा जाता है। विष्णु अर्थात् लक्ष्मी-नारायण का कम्बाइन्ड चित्र ऐसा बनाया है, इसलिए समझाया जाता है। बाकी विष्णु की जब पूजा करते हैं तो समझ नहीं सकते कि यह कौन हैं? महालक्ष्मी की पूजा करते हैं परन्तु समझते नहीं कि यह कौन है? बाबा अभी तुम बच्चों को भिन्न-भिन्न रीति से समझाते हैं। अच्छी रीति धारण करो। कोई-कोई की बुद्धि में रहता है कि परमात्मा तो सब कुछ जानते हैं। हम जो कुछ अच्छा वा बुरा करते हैं वह सब जानते हैं। अब इसको अन्धश्रद्धा का भाव कहा जाता है। भगवान इन बातों को जानते ही नहीं। तुम बच्चे जानते हो भगवान तो है पतितों को पावन बनाने...

कारण और परिणाम

इस जगत में व्यक्ति के द्वारा की गयी प्रत्येक इच्छा को समग्र चेतना तुरन्त पूरा करने हेतु बदलनी शुरू होती है,परन्तु यह इच्छा पूरी हो यह परिणाम पूरा हो वह घटना घट जाय जिसको हमने चाहा इससे पूर्व ही हम विरोधाभासी इच्छा कर देते हैं अथवा हमने काफी सारी इच्छाये की होती है एवं सम्मिलित परिणाम हम पाते है इसलिए मौजूद नियम समझ में स्पष्ट नही होता। मेरे देखे पुरे जगत की समग्र चेतना में हमारे सिर्फ विचार करने से ही बदलाव शुरू हो जाता है क्योंकि हम समग्र चेतना के हिस्से है हम अपने में ही अपनी चेतना में ही बीज/परिणाम का रोपण करते है जो परिणाम हम निर्धारित करते है उसके होने हेतु परिस्थिति बननी शुरू हो जाती है मैं एक दिन ओशो के प्रवचन का एक हिस्सा पढ़ रहा था जिसमे उन्होंने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है उस हिस्से को मैं यहा पूरा लिख देता हूँ जिससे चीजे स्पष्ट हो सके। मैं तुम्हें एक जीवन के गहरे कानूनों में से एक बताता हूं। तुमने इसके बारे में बिल्कुल नहीं सोचा होगा। तुमने सुना होगा कि –– और पूरा विज्ञान इस पर निर्भर करता है–– कि कारण और परि णामआधारभूत नियम है। तुम कारण निर्मित करो और परिणाम अनुसरण करता है...